मुर्गी पालन या Poultry farming कैसे करे डिटेल मे जानकारी

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मुर्गी पालन/ पोल्ट्री फार्मिंग या कुक्कुट पालन का बिजनेस कैसे करें डिटेल मे जानकारी

दोस्तों आज हम अपने लेख में जानेंगे कि मुर्गी पालन कैसे करें या मुर्गी पालन कैसे की जाती है इसके पालन से क्या-क्या लाभ होते हैं मुर्गी की कौन-कौन सी किस्म या नस्ल से ज्यादा अंडे मिलते हैं और किस-किस किस्म से मास जायदा मिलता है इस व्यवसाय में कितनी लागत लगती है सरकार इसके लिए कितने प्रतिशत ब्याज पर पैसे loan पर देती है भारत में मुर्गी पालन के प्रशिक्षण केंद्र कौन-कौन से हैं मुर्गी का गर्भकाल कितना होता है एक मुर्गी अपने जीवन काल में कितने अंडे देती है किस मुर्गे का मांस उपयोगी होता है तथा इसके पालन में किन-किन चीजों की जरूरत पड़ती है ताकि हम अच्छी तरह से मुर्गी पालन कर सकें इससे पहले के लेख में हमने मोती की खेती कैसे की जाती और इससे क्या क्या फायदे होते है की पूरी जानकारी दी थी
अब हम जानते हैं कि मुर्गी पालन क्या है और यह कैसे किया जाता है मुर्गी पालन या कुकुट पालन को इंग्लिश में poultry फार्मिंग बिजनेस कहते हैं आज की भागती दोड़ती जिंदगी में जहां सभी लोग कोई भी बिजनेस शुरू करने से पहले अपने बैंक बैलेंस को देख कर रह जाते हैं क्योंकि किसी भी छोटे-मोटे बिजनेस को शुरू करने में भारी भरकम लागत की जरूरत होती है वही मुर्गी पालन में बहुत ही कम लागत में हम इसको शुरू कर सकते हैं इसके लिए हमें कोई भारी-भरकम धनराशि की जरूरत नहीं होती है और ना ही किसी डिग्री की इस में काम करने में जरूरी नहीं कि इंसान पढ़ा लिखा ही हो इसके लिए तो बस थोड़ी जानकारी होना ही बहुत है जो कि हम आप को विस्तार मे देगे मुर्गी पालन में सबसे महत्वपूर्ण जगह का चुनाव होता है इसके लिए हमें सही जगह का चुनाव करना होता है जगह का चुनाव करते समय हमें उस जगह के पीएच मान को ज्ञात कर लेना चाहिए वह जगह का पीएच मान मुर्गियों के रखरखाव के लिए अनुकूल है कि नहीं एक मुर्गी के लिए एक से दो वर्ग फुट जगह की जरूरत होती है मुर्गी जीतने अधिक खुले एरिया मे रहे उनके विकसित होने की दर उतनी अच्छी होती है इस हिसाब से आपको 100 मुर्गियों के लिए 100 से 200 वर्ग फीट की कम से कम जगह की जरूरत पढ़ सकती है जगह का चुनाव करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह फार्म शहर के नजदीक हो तथा जहां-जहां हवा पानी और रोशनी की अच्छी व्यवस्था हो तथा जगह ना तो ज्यादा गीली और ना ही ज्यादा नमी युक्त हो अगर ऐसा होगा तो मुर्गियों में बीमारियां होने की संभावना बहुत जायदा रहती है जहां हम अपना फार्म बना रहे हैं वहां पर पानी की उचित व्यावस्था होनी चाहिए जिससे कि मुर्गियों को साफ सुथरा पानी मिले साथ ही फार्म शहर के पास होने से मुर्गियों को बेचने में भी हमें कोई दिक्कत नहीं होगी तथा मुर्गियों को दुकान तक ले जाने में किसी प्रकार का ज्यादा खर्चा नहीं होगा फार्म के चारों ओर मुर्गियों की सुरक्षा के लिए छेद दार जाली या बाउंड्री बाल बनी होना चाहिए जिससे कि जंगली जानवरों से, बिल्ली या कुत्तो से उनकी रक्षा हो सके मुर्गियों के पानी पिलाने के लिए बाजार में कई तरह के प्लास्टिक के उपकरण आने लगे हैं जिनसे उन्हें पानी पीने में आसानी होती है हम उनका भी उपयोग कर सकते हैं नहीं तो पानी की पाइप लाइन का की व्यवस्था कर सकते हैं जिससे हमें बार-बार पानी
बदलने की जरूरत नहीं होती है मुर्गियों के पीने के पानी को सुबह शाम बदलना चाहिए जिससे कि उन्हें बीमारियां ना हो और साथ ही उनके भोजन पर भी खास ध्यान रखना चाहिए उन्हें भोजन में गेहूं के दाने तथा ऐसा खाना देना चाहिए जिसमें कि प्रोटीन तथा कैल्शियम की मात्रा ज्यादा हो ताकि वह स्वस्थ रहें उनकी खाने और पीने के पानी के बर्तनों को समय-समय पर साफ करते रहना चाहिए अब तो मार्केट में भी मुर्गियों के भोजन के लिए दाना भी मिलता है जो कि काफी हेल्दी भी होता है उन्हें earthwarm भी खाना बहुत पसंद होता है पूरी poutry फार्मिंग में हमें लाइट की भी उचित व्यवस्था करनी चाहिए ठंड के मौसम में हमें बड़े बड़े बल्ब का उपयोग करना चाहिए ताकि उसकी रोशनी से उन्हें गर्माहट मिलती रहे तथा रात में भी लाइट ऑन ही रखना चाहिए जिससे कि मुर्गियों को दाना खाने और पानी पीने में आसानी हो मुर्गी जितना अधिक दाना खाएगी उतनी ही जल्दी वह बढ़ेगी और अंडे देने लायक हो जाएगी गर्मियों के मौसम में हमें उनके लिए शुद्ध हवा की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे कि वह जल्दी बड़ी हो जाए और मास बहुत अधिक मात्रा मे मिले,भारत में मुर्गियों की कई तरह की नस्लें पाई जाती हैं तथा सभी नस्लों में अपनी ही एक अलग विशेषता होती है तो आइए जानते हैं इनकी नस्लो के बारे में

कड़कनाथ :-

इसे काले मांस वाला पक्षी भी कहा जाता है क्योंकि बाहरी अंग के साथ-साथ यह आंतरिक रूप से भी काले रंग का होता हैं परंतु यह बहुत ही उपयोगी होता है इसके मीट का उपयोग कई तरह की देशी और विदेशी दबाओ में होता है इसके मीट में सबसे ज्यादा (25% तक) प्रोटीन पाया जाता है जो कि मुर्गे की और किसी जाती में नहीं पाया जाता है यह मुख्यता भारत के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में पाई जाती है इन मुर्गियों की प्रति वर्ष अंडे देने की क्षमता लगभग 80 होती है इस मुर्गी की जांघ तथा पैरों का रंग स्लेटी होता है इनकी अन्य किस्मे इस प्रकार है
जेडब्लेक और गोल्डन है दवाओं में मीट के उपयोग के कारण इसका मीट बहुत ही महगा होता है चाहे इसका मास हो या फिर egg हो l

असेल नस्ल ( Aseel) :-

इसको झगड़ालू मुर्गी के नाम से भी जाना जाता है भारत में यह मुख्यता उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में पाई जाती है इसका उपयोग अधिकतर मुर्गो को मैदान में लड़ाने में किया जाता हैं क्योंकि इसकी लड़ने की क्षमता औरो के मुकाबले अधिक होती है यह बचपन से लेकर अपनी मृत्यु तक लड़ने की अच्छी खासी क्षमता रखता है इस प्रजाति के मुर्गों में 4 से 5 किलो तथा मुर्गियों में 3 से 4 किलो वजन पाया जाता है इन के अंडे देने की क्षमता बहुत कम होती है यह अन्य मुर्गो के मुकाबले मानव जाति पर जल्दी ही विश्वास कर लेते हैं इन मुर्गियों की पैर और गर्दन लंबी तथा बाल चमकदार होते हैं इन मुर्गियों में सहनशक्ति तथा चतुराई अन्य के मुकाबले बहुत अधिक पाई जाती है इस नस्ल का उपयोग चिकन और अंडे के लिए जायदा नही किया जाता है इसकी अन्य नस्ले है जो कि भारत में पाई जाती हैं इनका नाम है पीली याकूब, नूरी कागार, चिता,जावा,सब्जा,टीका और रेजा आदि

ग्राम प्रिया नस्ल :-

इस किस्म की मुर्गियों का पालन भारत सरकार द्वारा हैदराबाद स्थित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत किया गया है यही कारण है कि इसका पालन ग्रामीण इलाकों में किसानों द्वारा अधिक तौर पर किया जाता है इस किस्म का प्रयोग अंडे और मीट दोनों के रूप में किया जाता है इसके अंडे का रंग भूरा होता है यह मुर्गी 12 हफ्ते में दो से ढाई किलो तक की हो जाती है यह मुर्गी 1 साल में 210 से 225 तक अंडे देने की क्षमता रखती है इसकी गर्दन लंबी तथा छोटी होती है इस नस्ल की मुर्गी का मीट तंदूरी चिकन में किया जाता है इसका पालन खुले मैदान में आसानी से किया जा सकता है इसलिए यह ग्रामीण इलाकों में अधिकतर पाली जाती है

चिटागोंग नस्ल या मलय नस्ल:-

इस नस्ल की मुर्गियों का पालन अंडे और मीट दोनों की आपूर्ति के लिए किया जा सकता है इस नस्ल के मुर्गों तथा मुर्गियां दो से 2.5 फीट तक उची होती हैं जो कि अन्य के मुकाबले अधिक हैं मुर्गों का बजन 4 से 5 किलो तथा मुर्गियों में 2.5 से 4 किलो तक पाया जाता है इन की गर्दन लंबी और कलगी छोटी होती है और इनकी पूंछ छोटी तथा भरी हुई होती है इनके पैरों का रंग पीला होता है तथा यह बहुत ही मजबूत होते हैं इनकी अन्य किस्मों काले, भूले, सफेद तथा गहरे भूरे रंग की होती हैl

पंजाब ब्राउन चिकन ब्रीड:-

इस किस्म की मुर्गियां भारत में मुख्यता पंजाब और हरियाणा में पाई जाती हैं वहां पर इनका पालन छोटे तथा बड़े किसानों, दोनों के द्वारा किया जाता है शुरुआत में इसका उपयोग सिर्फ खुद के खाने के चिकन के लिए लिए ही किया जाता था परंतु अब इसका उपयोग व्यापार के रूप में भी किया जाने लगा इस नस्ल की मुर्गे का वजन 1 से 2 किलो तक होता है तथा मुर्गी का भजन एक से डेढ़ किलो तक का ही होता है यह मुर्गिया 5 से 7 महीनों की होते ही अंडे देना शुरु कर देती है इनके बाल लाल रंग के होते हैं तथा लम्बे भी होते हैं इनके पंखो का रंग लाल भूरा होता है तथा उन पर काले रंग के धब्बे होते हैं इनकी चोंच अन्य किस्मों के मूर्गो के मुकाबले बड़ी होती है तथा लाल भी होती है यह 1 वर्ष में 60 से 80 के बीच अंडे देने की क्षमता रखती हैंl

स्वरनाथ नस्ल:-

यह भारत के कर्नाटक के पशु चिकित्सा एवं मत्स विज्ञान और विश्वविद्यालय बेंगलुरु द्वारा विकसित की गई चिकन की एक नस्ल है इसका वजन 3 से 4 किलो तक होता है यह 22 से 23 सप्ताह में पूर्ण रूप से बिक्सित हो जाती हैं तथा इनके अंडे देने की क्षमता 180 से 190 प्रति वर्ष होती है

कामरूप नस्ल:-

यह नस्ल असम में मुर्गी की प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए “अखिल भारतीय समन्वय अनुसंधान परियोजना” द्वारा विकसित की गई है इस नस्ल में तीन अलग-अलग प्रकार की नसों का समावेश है इस मुर्गी के अंडे देने की क्षमता 118 से 130 प्रति वर्ष होती है इनका वजन 2 किलो से 2.5 किलो तक होता हैl

केरीश्यामा नस्ल :-

यह नस्ल भारत के मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में पाई जाती है इस नस्ल को कड़कनाथ तथा केरीलाल नस्ल का क्रॉस नस्ल माना जाता है इस के अंडे देने की क्षमता प्रतिवर्ष 85 है तथा यह 24 हफ्ते में अंडे देने के लिए तैयार हो जाती है और इसका वजन उस समय लगभग 1.2 किलोग्राम होता हैl

झार सीम नस्ल:-

यह नस्ल भारत के झारखंड राज्य में पाई जाती है इसके कारण उसका नाम भी वही से मिलता-जुलता है इस नस्ल की मुर्गी का पालन झारखंड की आदिवासी जनजातियों की आय का मुख्य स्रोत है जब यह अपने जीवन के 180 दिन पूरे कर लेती है तव यह अपना प्रथम अंडा देना शुरू करती है तथा 1 वर्ष में 165 से 170 तक अंडे देने की क्षमता रखती है इसका वजन लगभग डेढ़ से 2 केजी का होता है भारत में पाई जाने वाली अन्य नस्लें भारत में इसके अलावा और भी कई प्रकार की नस्लों की मुर्गियां पाई जाती हैं जिनके नाम इस प्रकार है अंकलेश्वर, कश्मीर,फेवरोला, कृष्णा -जे,कलिंग ब्राउन, कलिस्थ, कोमान, कालाहारी, कैरीगोल्ड, ग्राम लक्ष्मी, गुजरी, ग्राम प्रिय, गिरिराज,धूमसी,धन राजा, टेलिचेरी, घागस, डंकी,निकोबारी, यमुना, बूमरा, मृत्युजय, बजरा, मिरी, हरीगाटाब्लैक, वेजागुडा, आदि नस्ल भी पायी जाती हैl

आप लोग भी जी चाहे तो अपने घर पर भी बॉयलर मुर्गी फार्म या देसी मुर्गी का पालन करके अपना छोटा सा व्यापार आज ही शुरु कर सकते हैं मुर्गी पालन के लिए भारत सरकार ने भी अपनी तरफ से कई कदम उठाए हैं इस व्यवसाय को करने के लिए सरकार बहुत ही कम ब्याज पर पैसा लोन पर देती है क्योंकि यह व्यवसाय एक तरीके से किसानों का ही व्यवसाय है और इसे कोई भी व्यक्ति कम से कम लागत में शुरू कर सकता है

मुर्गी पालन के हेतु प्रशिक्षण केंद्र:-

 

अधिकतर लोग मुर्गी पालन का व्यवसाय तो शुरू कर देते हैं पर उन्हें इस बारे में सही जानकारी नहीं होती है कि उनका रखरखाव कैसे करें तथा मुर्गियों के लिए क्या सही है और क्या गलत है जिसके चलते उन्हें भारी भरकम नुकसान उठाना पड़ता है भारत सरकार ने इसके लिए कई अनुसंधान खोले हैं जिनमें से एक है भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बरेली में स्थित है जहां पर लोगों को इसके पालन के लिए जरूरी जानकारी दी जाती है तथा उन्हें कैसे मुर्गी पालन की शुरुआत करनी है यह प्रशिक्षण भी दिया जाता है केंद्रीय पक्षी अनुसंधान बरेली समय-समय पर मुर्गी पालन के प्रशिक्षण के लिए कार्यक्रम आयोजित करता है वहां के निदेशक बताते हैं कि सरकार ने इसके लिए कुक्कुट नीति का पालन किया है जिसके कारण इस व्यवसाय के लिए अब किसान ही नहीं बल्कि पढ़े लिखे लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं इस केंद्र में 2 तरीके से प्रशिक्षण दिया जाता है इसके (ट्रेनिंग ) प्रशिक्षण में कोई फीस नहीं ली जाती है यह ट्रेनिंग 10 से 12 दिन तक चलती है और जब लोगों की संख्या 50 से 60 हो जाती है तो वे इस शिक्षण को शुरू कर देते हैं इसमे किसी किस्म की फीस नहीं ली जाती है बस लोगों को अपने खाने-पीने और रहने की व्यवस्था खुद करनी होती है पहले इसमे सिर्फ किसान ही भाग लेते थे लेकिन अब इसमें पढ़े लिखे लोग भी भाग लेने लगे हैंl
दूसरा प्रकार का ट्रेनिंग प्रोग्राम विशेष होता है जैसे कि हैचरी, लेयर पालन या फिर ब्रायलर पालन इसकी अवधि 14 दिन की होती है तथा इसके लिए फीस भी ली जाती है इसके अलावा किसान और भी कई निजी संस्थाओ से भी प्रशिक्षण ले सकते हैं इसके अलाबा लोग अपने जिले में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर भी संपर्क कर सकते हैं यहां पर समय-समय पर लोगों को ट्रेनिंग दी जाती है मुर्गी पालन का प्रशिक्षण लेने वाले लोग संस्थान में फोन पर या फिर ईमेल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं जब रजिस्ट्रेशन हो जाता है तो इसके बाद जब ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया जाता है तो लोगों को केंद्र द्वारा फोन के माध्यम से या ईमेल के माध्यम से प्रशिक्षण देने के लिए बुला लिया जाता है अगर आप को आर्टिकल अच्छा लगा हो तो आर्टिकल को like और share करना ना भूले
धन्यवाद ,जय हिंद जय भारत

 

 

 

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